अध्यक्ष, बिहार मानवाधिकार आयोग 

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एक परिचय

बिहार मानवाधिकार आयोग मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत स्थापित एक संस्था है। उक्त अधिनियम में राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोग की व्यवस्था है।

बिहार राज्य में मानवाधिकार आयोग की स्थापना दिनांक 03-01-2000 को अधिसूचना संख्या 207 द्वारा की गयी परंतु इसका औपचारिक गठन दिनांक 25-06-2008 को अधिसूचना संख्या 6896 द्वारा किया गया, जब जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय एवं राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एस. एन. झा अध्यक्ष के रूप में तथा पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री राजेन्द्र प्रसाद और बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री आर. आर. प्रसाद सदस्य के रूप में उनके पदभार ग्रहण करने की तिथि से नियुक्त हुए। श्री आर.आर.प्रसाद के असामयिक निधन के पश्चात् श्री नीलमणि जो पुलिस महानिदेशक, बिहार रह चुके हैं, को दिनांक 1 दिसंबर 2011 को आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया। माननीय न्यायमूर्ति श्री राजेन्द्र प्रसाद ने दिनांक 26 जून, 2013 को तथा माननीय अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री एस.एन.झा ने 3 नवंबर, 2013 को अपना कार्यकाल पूरा किया।

 

सामान्य

मानवाधिकार आयोग मानवाधिकारों का पहरेदार है। यह एक स्वशासी उच्च शक्ति प्राप्त संस्था है, जिसे मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 से अधिकार एवं शक्तियाँ प्राप्त हैं। इसकी स्वायतत्ता अन्य बातों के अतिरिक्त अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति की पद्धति में, उनके निश्चित (fixed) कार्यकाल एवं अधिनियम की धारा 23 में उपबंधित वैधिक गारंटी तथा धारा 33 में वर्णित वित्तीय स्वायत्ता में है। आयोग की हैसियत इसके अध्यक्ष, सदस्य एवं पदाधिकारीगण के लिए विनिर्दिष्ट योग्यता से मालूम होती है। अन्य आयोगों से भिन्न किसी उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ही अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किये जा सकते हैं। उसी प्रकार राज्य सरकार के सचिव ही इसके सचिव हो सकते हैं। आयोग की अपनी एक अनुसंधान शाखा है, जिसके प्रमुख पुलिस महानिरीक्षक रैंक के पुलिस अधिकारी होते हैं।

 

प्रकीर्ण

शब्द मानवाधिकार मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा  2 (घ) में परिभाषित है, जिसके अन्तर्गत मानवाधिकार से अभिप्राय है संविधान में उल्लिखित अथवा अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा में अंगीभूत व्यक्ति की जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा से संबंधित अधिकार जो न्यायालय द्वारा लागू योग्य हो ।

अभिव्यक्ति 'मानवाधिकार' इस प्रकार काफी व्यापक है, जिसके अन्तर्गत वे सब मुद्दे आते हैं जो जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा के परिधि के भीतर हैं ।

इस प्रकार मानवाधिकार का उल्लंघन पुलिस ज्यादती, अभिरक्षा (custodial) मृत्यु, मुठभेड़ में मृत्यु, पुलिस या अन्य पदाधिकारी/लोक सेवक द्वारा व्यक्तियों को परेशान करना तक ही सीमित नहीं है । इसके अन्तर्गत अन्य सिविल, राजनीतिक, शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों, जिससे रिमांड होम या कारागारों की दशा, मजदूर वर्ग की दशा, दहेज मृत्यु या दहेज की मांग, बलात्कार और हत्या, लैंगिक प्रताड़ना, महिलाओं पर अत्याचार एवं अप्रतिष्ठा, बाल मजदूर और बंधुआ मजदूर, बाल-विवाह, समुचित शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित करना, गरीबी उन्मूलन तथा सामाजिक सुरक्षा संबंधित कार्यक्रम, समुचित स्वच्छता की दशाएँ, स्वस्थ वातावरण आदि से संबंधित अधिकार भी प्राप्त हैं, यदि वे अधिकार न्यायालयों द्वारा बाध्य किये जाने योग्य हों ।